﻿WEBVTT

00:01:05.307 --> 00:01:20.405
यह श्री समयसार जी परमागम शास्त्र है।
उसका प्रथम जीव नाम का अधिकार है।
उसमें २६वीं गाथा का शीर्षक है।

00:01:20.429 --> 00:01:27.321
<b>अब अप्रतिबुद्ध जीव </b>
यानि अज्ञानी जीव,
जो देह को ही आत्मा माननेवाला,

00:01:27.345 --> 00:01:34.930
उसका नाम अप्रतिबुद्ध, अज्ञानी,
मिथ्यादृष्टि जीव कहा जाता है।

00:01:34.954 --> 00:01:40.516
ऐसा <b>जीव कहता है
उसकी गाथा कहते हैं :-</b>

00:01:40.540 --> 00:01:46.667
<b>गाथार्थ:- </b>अज्ञानी
<b> अप्रतिबुद्ध जीव कहता है कि
- यदि जीव शरीर नहीं है तो </b>

00:01:46.691 --> 00:01:55.187
यानि जो जीव है, वो शरीर नहीं है तो,
<b>तीर्थंकर-आचार्योंकी जो स्तुति की गई है </b>

00:01:55.211 --> 00:02:00.654
यानि आचार्य भगवान की स्तुति,
तीर्थंकर भगवान की स्तुति की जाती है

00:02:00.678 --> 00:02:06.121
<b>वह </b>पूरी ही, <b>सभी मिथ्या </b>
यानि <b>(झूठी) होती है; </b>

00:02:06.145 --> 00:02:13.374
शास्त्र में स्तुति का ब्यान
तो बहुत आता है और
ये जिनागम की बात है।

00:02:13.398 --> 00:02:21.107
शिष्य कहता है कि
हमने जिनागम में पढ़ा है कि तीर्थंकर की,
आचार्य भगवान की स्तुति होती है।

00:02:21.131 --> 00:02:29.574
तो जो आप ऐसा कहें कि
जीव और शरीर भिन्न है तो फिर
स्तुति खोटी (झूठ) होगी, मिथ्या होगी।

00:02:29.598 --> 00:02:36.730
<b>इसलिये हम समझते हैं कि
जो आत्मा है वह देह ही है। </b>

00:02:36.754 --> 00:02:41.294
यानि देह सो ही आत्मा है,
देह और आत्मा कोई अलग चीज है नहीं।

00:02:41.318 --> 00:02:46.954
दो पदार्थ हैं,
ऐसा हमें जानने में आता नहीं है।

00:02:46.978 --> 00:02:51.783
<b>टीका:- जो आत्मा है
वही पुद्गलद्रव्यस्वरूप यह शरीर है। </b>

00:02:51.807 --> 00:02:56.236
जो जीव है,
वो ये पुद्गलद्रव्य स्वरूप जो शरीर है,
वो ही जीव है।

00:02:56.260 --> 00:03:01.965
जीव और पुद्गल शरीर भिन्न-भिन्न नहीं हैं,
एक ही पदार्थ है उसका नाम ही जीव है।

00:03:01.989 --> 00:03:05.832
इससे जीव भिन्न
हमको जानने में आता नहीं है।

00:03:05.856 --> 00:03:15.472
<b>यदि ऐसा न हो तो </b>
यानि शरीर वही जीव है, इसलिए
तीर्थंकर-आचार्यों की स्तुति करने में आई है।

00:03:15.496 --> 00:03:20.981
तीर्थंकर भगवान की स्तुति होती है।
भगवान की स्तुति,
अरिहंत की प्रतिमा की पूजा होती है

00:03:21.005 --> 00:03:28.499
वो तो सब देखकर के पूजा करते हैं।
हें? तो ये आत्मा और शरीर एक ही चीज है,
एक ही चीज है।

00:03:28.523 --> 00:03:33.176
<b>यदि ऐसा न हो तो
तीर्थंकर-आचार्योंकी जो स्तुति की गई है
वह सब मिथ्या सिद्ध होगी। </b>

00:03:33.200 --> 00:03:39.321
यानि मिथ्या हो जाये,
स्तुति मिथ्या होती नहीं है।
स्तुति तो है, लिखी है शास्त्र में।

00:03:39.345 --> 00:03:42.534
मिथ्या कैसे होवे?
ऐसे।

00:03:42.558 --> 00:03:46.027
<b>वह स्तुति इसप्रकार है:- </b>
अभी उसकी दलील करते हैं।

00:03:46.051 --> 00:03:52.010
अज्ञानी जीव अपनी ओर से दलील करता है।
हम तो शरीर को ही जीव मानते हैं।

00:03:52.034 --> 00:04:02.201
शरीर से भिन्न कोई आत्मा हमको जानने
में आता नहीं है। क्यों नहीं आता है?
उसका कारण आपको ख्याल (में) आया?

00:04:02.225 --> 00:04:09.432
शरीर को देखकर देह और जीव को
एक मानता है - एक बात,
वो तो मानता है।

00:04:09.456 --> 00:04:15.134
और जो शरीर को ही आत्मा मानता है
उसका कारण क्या है?

00:04:15.158 --> 00:04:24.667
शरीर से भिन्न जीव उसकी दृष्टि में
नहीं आता है और शरीर ही देखकर
शरीर को ही आत्मा जानता-मानता है,

00:04:24.691 --> 00:04:27.576
उसका कारण क्या है,
मालूम है आपको?

00:04:27.600 --> 00:04:36.285
उसका कारण ये है कि
इंद्रियज्ञान से शरीर ही जानने में आता है,
इंद्रियज्ञान से आत्मा जानने में (नहीं आता है)।

00:04:36.309 --> 00:04:41.192
मुमुक्षु: मुख्य बात यह है,
ये है मुख्य बात।

00:04:41.216 --> 00:04:44.016
इंद्रियज्ञान से वो शरीर को जानता है,
वो सोचता है (कि) यही आत्मा है।

00:04:44.040 --> 00:04:48.765
पू. लालचंदभाई: हाँ!
उसके पास अतीन्द्रियज्ञान तो है ही नहीं।

00:04:48.789 --> 00:04:55.272
अतीन्द्रियज्ञान प्रगट हो
तो-तो शरीर को आत्मा नहीं माने
और इंद्रियज्ञान से जानता है शरीर,

00:04:55.296 --> 00:04:59.925
और शरीर को आत्मा मान लेता है
- वो तो नियम है।

00:04:59.949 --> 00:05:06.496
वो (बात) वहाँ से शुरू होती है
और ३१ वीं गाथा का ये मूल है।

00:05:06.520 --> 00:05:11.192
मुमुक्षु: उसका जवाब ३१वीं गाथा में आयेगा।
पू. लालचंदभाई: उसका जवाब
३१ वीं गाथा में आयेगा।

00:05:11.216 --> 00:05:16.481
इंद्रियज्ञान का धर्म है कि
अपने अमूर्तिक आत्मा को जानता नहीं है

00:05:16.505 --> 00:05:24.370
और मूर्तिक शरीर को जानता है
और मूर्तिक शरीर को जानते-जानते
उसको ही जीव मान लेता है।

00:05:24.394 --> 00:05:27.650
वो ही माना,
अनंतकाल से वो ही माना।

00:05:27.674 --> 00:05:36.943
जैसे उसके अंदर मर्म है, ये दोनों ही गाथाओं में 
मर्म है कि जैसे उनके (तीर्थंकर का)
शरीर को जीव माना (कि) ये जीव है,

00:05:36.967 --> 00:05:42.245
तो इसको (अपने शरीर को) जानते (हुए)
उसको भी जीव मान लिया है।
वहाँ से इधर आया।

00:05:42.269 --> 00:05:45.561
मुमुक्षु: वहाँ उनका शरीर देखा
तो शरीर को ही भगवान मान लिया।
पू. लालचंदभाई: तो (वे) तीर्थंकर हैं,

00:05:45.585 --> 00:05:48.316
भगवान हैं,
भगवान हैं।

00:05:48.340 --> 00:05:57.543
तो शरीर को देखकर भगवान माना,
तो इसको (अपने शरीर को भी)
देखकर आत्मा मान लिया।

00:05:57.567 --> 00:06:02.125
उनके माध्यम से इसको
(अपने शरीर को) भी आत्मा मान लिया।

00:06:02.149 --> 00:06:09.076
स्तुति के बहाने पर,
भगवान की स्तुति करने गया मंदिर में,
स्तुति की, पूजा की,

00:06:09.100 --> 00:06:15.650
मैंने भगवान का दर्शन किया,
भगवान की पूजा की,
वंदन की, स्तुति की, सब किया।

00:06:15.674 --> 00:06:22.490
तो वो अब कोई पूछे कि
आपको क्या देखने में आया?
कि मैंने भगवान का दर्शन किया।

00:06:22.514 --> 00:06:27.356
मुमुक्षु: भगवान का दर्शन कहाँ हुआ?
पू. लालचंदभाई: उसने देखा शरीर।

00:06:27.380 --> 00:06:29.387
मुमुक्षु: शरीर को देखकर के
भगवान का दर्शन मानता है।

00:06:29.411 --> 00:06:34.739
पू. लालचंदभाई: मानता है।
तो शरीर तो आत्मा नहीं है।
मुमुक्षु: भगवान तो शरीर से भिन्न हैं।

00:06:34.763 --> 00:06:38.816
पू. लालचंदभाई: भगवान तो वहाँ बैठे हैं,
समवशरण में विराजमान।

00:06:38.840 --> 00:06:43.201
वो तीर्थंकर साक्षात् भगवान,
उनसे (शरीर से) केवली भगवान तो भिन्न हैं।

00:06:43.225 --> 00:06:47.312
मगर उसको (शरीर को) देखकर
ये अरिहंत भगवान हैं ऐसा मान लिया।

00:06:47.336 --> 00:06:51.925
ये आचार्य भगवान,
आचार्य भगवान का शरीर देखता है,
आचार्य भगवान की स्तुति करता है,

00:06:51.949 --> 00:06:57.796
पड़गाता है, तब तो 'ये आचार्य हैं’
- शरीर को जीव मान लिया।

00:06:57.820 --> 00:07:01.850
और वहाँ शरीर को जीव मान लिया
इसका कारण क्या है?

00:07:01.874 --> 00:07:07.779
इसको (अपने शरीर को) जीव मानता है
इसलिए अपनी बुद्धि वहाँ
(आचार्य भगवान में) भी लगा दी।

00:07:07.803 --> 00:07:16.743
अपनी मान्यता, अज्ञानी की, शरीर को ही
आत्मा मान रखा है अनंतकाल से तो
उसको ऐसा भ्रम हो गया कि शरीर वो ही जीव है।

00:07:16.767 --> 00:07:20.619
शरीर से,
इस (अपना) शरीर से भिन्न जीव
उसको ख्याल नहीं आया।

00:07:20.643 --> 00:07:23.779
तो उसका (आचार्य का) शरीर से उसका आत्मा
भिन्न है - ये ख्याल (तो) कहाँ से आवे?

00:07:23.803 --> 00:07:27.536
इधर जो भिन्न पड़े
तो वहाँ ख्याल आ जावे।

00:07:27.560 --> 00:07:32.423
इधर तो भिन्न पड़ा नहीं,
शरीर और आत्मा का भेदज्ञान करके
आत्मा का अनुभव तो नहीं किया;

00:07:32.447 --> 00:07:37.734
और शरीर को देखकर, इसको
(अपने शरीर को) इन्द्रियज्ञान से देखकर
उसको (अपने शरीर को) जीव मान लिया।

00:07:37.758 --> 00:07:43.103
इसको जीव माना
तो वहाँ उनके शरीर को देखकर,
वो ही भगवान (हैं, ऐसा) मान लिया।

00:07:43.127 --> 00:07:50.583
तो शरीर और आत्मा तो भिन्न हैं।
आचार्य भगवान कहते हैं (कि)
तेरी भूल हो गई । समझे?

00:07:50.607 --> 00:07:55.090
ये स्तुति बढ़िया है। अच्छी स्तुति है।
मुमुक्षु: समझने जैसी है।

00:07:55.114 --> 00:08:05.232
पू. लालचंदभाई: समझने जैसी है।
इंद्रियज्ञान जिसको जानता है
उसको आत्मा मानता है - सिद्धांत।

00:08:05.256 --> 00:08:10.196
इंद्रियज्ञान समझे न?
आँख से देखना, कान से सुनना,

00:08:10.220 --> 00:08:20.241
ऐसा ये इंद्रियज्ञान से जिस पदार्थ को
देखता है उसको ही जीव मानता है।
इसलिए वो भूल हो गई।

00:08:20.265 --> 00:08:25.814
अभी वो भूल निकालने का
३१ गाथा में जबाव देंगे, यथार्थ।

00:08:25.838 --> 00:08:29.970
<b>श्लोकार्थ :- वे तीर्थंकर-
आचार्य वन्दनीय हैं। कैसे हैं वे? </b>

00:08:29.994 --> 00:08:36.754
अपनी दलील करते हैं कि
<b>अपने शरीरकी कान्तिसे दसों
दिशाओंको धोते हैं-निर्मल करते हैं, </b>

00:08:36.778 --> 00:08:42.174
इतना तेज है परम औदारिक शरीर (का)
कि सूर्य का प्रकाश फीका हो जाए उसमें।

00:08:42.198 --> 00:08:49.703
इतना सूर्य के प्रकाश से
अनंतगुणा प्रकाश देह का,
आत्मा का नहीं (अभी तो) शरीर की बात है।

00:08:49.727 --> 00:08:58.267
ये प्रकाश जो है ये पुद्गल का है।
अरिहंत भगवान का नहीं है।
कुछ समझ में आया?

00:08:58.291 --> 00:09:02.247
मुमुक्षु: उसमें आता है न,
पूजा वो चन्द्रप्रभु की।

00:09:02.271 --> 00:09:04.570
मुमुक्षु: हाँ!
तो वो शरीर की बात है कि आत्मा की?

00:09:04.594 --> 00:09:07.205
मुमुक्षु: शरीर की बात है।
वो आत्मा की बात नहीं हैं।
पू. लालचंदभाई: नहीं है।

00:09:07.229 --> 00:09:12.961
मुमुक्षु: हमारे यहाँ
नेमिनाथ भगवान की प्रतिमा है
और ये बहुत वहाँ भक्ति करें, करावें।

00:09:12.985 --> 00:09:16.845
काले वर्ण के नेमिनाथ...
काले रंग के थे न नेमिनाथ?
पू. लालचंदभाई: हाँ! काले रंग के थे।

00:09:16.869 --> 00:09:21.281
मुमुक्षु: श्याम! तो काला रंग किसका था?
शरीर का था?
मुमुक्षु: शरीर का था।

00:09:21.305 --> 00:09:28.263
पू. लालचंदभाई: नेमिनाथ भगवान का था?
मुमुक्षु: नहीं! शरीर का था।
पहले जानते नहीं थे तो ऐसे बताते थे।

00:09:28.287 --> 00:09:36.827
पू. लालचंदभाई: हाँ! कोई परेशानी नहीं,
कोई परेशानी नहीं। अभी समझ में
धीमे-धीमे आएगा, कोई प्रश्न नहीं है।

00:09:36.851 --> 00:09:41.210
तो <b>अपने शरीरकी कान्तिसे
दसों दिशाओंको धोते हैं-निर्मल करते हैं, </b>
प्रकाशते हैं।

00:09:41.234 --> 00:09:45.596
वो परम औदारिक शरीर हो गया
उनका तो इतना प्रकाश है,

00:09:45.620 --> 00:09:53.027
वो जीव का प्रकाश नहीं है,
शरीर का है प्रकाश! ज्ञानमाला जी!
वो शरीर का प्रकाश है।

00:09:53.051 --> 00:09:56.947
प्रकाश जो है न प्रकाश,
ये पुद्गल की अवस्था है।

00:09:56.971 --> 00:10:02.267
अरूपी चेतन आत्मा का प्रकाश
नहीं होता है, ज्ञान होता है।
उसमें ज्ञान-प्रकाश होता है।

00:10:02.291 --> 00:10:09.834
ये जड़ का प्रकाश आत्मा में नहीं है।
वो तो पुद्गल की स्थिति है। अच्छा!

00:10:09.858 --> 00:10:14.885
स्वयं, <b>अपने तेजसे उत्कृष्ट तेजवाले
सूर्यादिके तेजको ढक देते हैं, </b>स्वयं,

00:10:14.909 --> 00:10:22.334
<b>अपने तेजसे </b>इसमें है, भगवान
<b>अपने तेज से </b>भगवान की
बात करता है वो अज्ञानी,

00:10:22.358 --> 00:10:26.250
कि भगवान का इतना तेज है,
शरीर का तेज नहीं बोलता है।

00:10:26.274 --> 00:10:36.521
भगवान का इतना तेज है कि
सूर्य का प्रकाश फीका पड़ता है, इतना।
हमारे भगवान का प्रकाश तो देखो!

00:10:36.545 --> 00:10:40.259
मुमुक्षु: शरीर को भगवान मानता है
तब ऐसी बात करता है।

00:10:40.283 --> 00:10:47.414
पू. लालचंदभाई: अर्थात् शरीर को
भगवान क्यों मानता है? कि इस
(अपने) शरीर को आत्मा मानता है इसलिए।

00:10:47.438 --> 00:10:54.254
इस शरीर को जीव मानता है,
मेरापना मानता है तो वहाँ भी,
अपनी बुद्धि वहाँ पर स्थाप (लगा) दी।

00:10:54.278 --> 00:11:02.443
जैसा अभिप्राय इधर (अपने लिए) तो सब
जगह और सब शरीर देखो तो जीव है, जीव है,
जीव है; एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय जीव।

00:11:02.467 --> 00:11:09.583
वो तो शरीर के नाम हैं!
दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय जीव नहीं है,
उसके अंदर विराजमान भगवान आत्मा भिन्न है।

00:11:09.607 --> 00:11:17.881
शरीर से भिन्न है आत्मा।
तलवार और म्यान जैसे भिन्न है
ऐसे शरीर और आत्मा भिन्न है।

00:11:17.905 --> 00:11:22.845
म्यान में तलवार रहती है मगर म्यान
तलवार होती है? हो सकती नहीं है।

00:11:22.869 --> 00:11:32.619
तलवार भिन्न है (और) म्यान भी भिन्न है -
ऐसा है। वो म्यान (शरीर) है, उस म्यान
में चैतन्य प्रभु - तलवार विराजमान है।

00:11:32.643 --> 00:11:38.512
वो तलवार भिन्न (और) म्यान भिन्न।
ये तो કોથળા (बोरी) है, बोरी।
क्या कहते हैं?

00:11:38.536 --> 00:11:43.565
बारदान खाली,
दाल का बारदान (अर्थात्) बोरी।
ये तो बोरी है, बारदान।

00:11:43.589 --> 00:11:52.001
इसमें दाल अलग है।
मीठी दाल अलग है। ऐसा ये चैतन्य
मीठा-मधुर इससे (शरीर से) अलग है।

00:11:52.025 --> 00:11:55.361
मुमक्षु: बस! इतना समझे
तो ही सब समझ में आ जाये।
पू. लालचंदभाई: सब समझ में आ जाये।

00:11:55.385 --> 00:12:03.579
देह और आत्मा भिन्न समझे तो अनुभव होता है।
वहाँ उसमें राग और पर्याय से
भिन्न की कोई जरूरत नहीं।

00:12:03.603 --> 00:12:12.232
क्योंकि देह जो भिन्न है,
तो ये देह जो भिन्न है पर है
वैसे सब - पर्याय मात्र,

00:12:12.256 --> 00:12:19.663
पुद्गल के परिणाम ये सब
उसमें समा जाते हैं।
समा जाते हैं। अच्छा!

00:12:19.687 --> 00:12:26.467
<b>अपने रूपसे लोगोंके मनको हर लेते हैं, </b>
भगवान अपनेरूप से लोगों के मन हर लेते हैं।

00:12:26.491 --> 00:12:34.027
देखने पर, आहाहा!
ऐसे बाहुबली की प्रतिमा देखो।
आहाहा! मन हरण करती है।

00:12:34.051 --> 00:12:43.103
अच्छी, बहुत मनोहर प्रतिमा है।
मनोहर-मनोहर मन को हर लेती है
प्रतिमा आहाहा! बाहुबली की।

00:12:43.127 --> 00:12:47.521
देखा न आपने? दर्शन किया कि नहीं?
मुमुक्षु: अभी नहीं गए गोम्मटेश्वर।
पू. लालचंदभाई: अरे! जाओ जाओ,

00:12:47.545 --> 00:12:57.294
एक दफे जाओ।
गोम्मटेश्वर जाना,
कभी समय मिले तो यात्रा में जाना।

00:12:57.318 --> 00:13:05.272
<b>अपने रूपसे लोगोंके मनको हर लेते हैं,
दिव्यध्वनिसे (भव्योंके) कानोंमें साक्षात्
सुखामृत बरसाते हैं </b>आहाहा!

00:13:05.296 --> 00:13:11.192
भगवान की वाणी, भगवान की वाणी!
भगवान की क्या वाणी होती है?
मुमुक्षु: नहीं!

00:13:11.216 --> 00:13:14.525
पू. लालचंदभाई: नहीं?
तो इधर लिखा तो भगवान की वाणी।

00:13:14.549 --> 00:13:21.156
मुमुक्षु: शरीर का परिणमन,
वो तो भाषा वर्गणा का परिणमन है।

00:13:21.180 --> 00:13:23.672
पू. लालचंदभाई: पुद्गल का है कि जीव का?
मुमुक्षु: पुद्गल का है।

00:13:23.696 --> 00:13:25.099
पू. लालचंदभाई: अच्छा!
भाषा जीव की नहीं है?

00:13:25.123 --> 00:13:28.881
मुमुक्षु: भाषा जीव की नहीं है,
भिन्न है वो तो।
पू. लालचंदभाई: अच्छा! भिन्न है?

00:13:28.905 --> 00:13:32.805
मुमुक्षु: बिल्कुल भिन्न है।
मुमुक्षु: भगवान नहीं बोलते हैं?
मुमुक्षु: नहीं।

00:13:32.829 --> 00:13:36.934
मुमुक्षु: भगवान क्या करते हैं?
मुमुक्षु: नहीं!
भगवान तो अपने स्वरूप में लीन रहते हैं।

00:13:36.958 --> 00:13:38.403
पू. लालचंदभाई: स्वरूप में लीन रहते हैं।

00:13:38.427 --> 00:13:51.032
मुमुक्षु: वाह! भिन्नता ही है
वाणी की और आत्मा की।
पू. लालचंदभाई: जुदाई, जुदाई।

00:13:51.056 --> 00:13:56.170
मुमुक्षु: भाषा वर्गणा परिणमित होती है,
तो शरीर तो उस समय होता है न।

00:13:56.194 --> 00:13:58.370
पू. लालचंदभाई: आत्मा के कारण से
होती है न भाषा?
मुमुक्षु: नहीं!

00:13:58.394 --> 00:14:03.659
पू. लालचंदभाई: नहीं?
मुमुक्षु: नहीं! उसमें तो अंश भी नहीं (है)
आत्मा का।

00:14:03.683 --> 00:14:10.045
पू. लालचंदभाई: आत्मा कारण नहीं है?
मुमुक्षु: आत्मा का अंश हो तो फिर 
ये..., ये..., इसमें तो आ जाना चाहिए।

00:14:10.069 --> 00:14:14.787
पू. लालचंदभाई: अच्छी बात है!
<b>कानोंमें साक्षात् सुखामृत बरसाते हैं</b>

00:14:14.811 --> 00:14:18.187
<b>और वे एक हजार
आठ लक्षणोंके धारक हैं।२४।</b>

00:14:18.211 --> 00:14:23.090
वो जो एक हजार आठ लक्षण हैं
वो शरीर के हैं, आत्मा के लक्षण नहीं है।

00:14:23.114 --> 00:14:30.974
आत्मा का लक्षण ज्ञान है।
आत्मा का लक्षण ज्ञान है और शरीर के
लक्षण, एक हजार आठ शरीर के लक्षण हैं।

00:14:30.998 --> 00:14:35.176
ये ध्वजा और ये साथिया (स्वस्तिक)
और सब बहुत आते हैं लक्षण। हें?

00:14:35.200 --> 00:14:40.210
वो शरीर के अंदर (ऊपर) चिन्ह है,
शरीर के अंदर चिन्ह है।
शंख होता है, इसमें शंख होता है।

00:14:40.234 --> 00:14:48.699
ध्वजा होती है न? उसमें होती है।
समझे? तो ये आत्मा में नहीं है,
वो तो पुद्गल की अवस्था है।

00:14:48.723 --> 00:14:59.605
मुमुक्षु: तो ये सहस्त्रनाम क्या है?
ये एक हजार आठ नाम जो हैं न?

00:14:59.629 --> 00:15:02.752
पू. लालचंदभाई: वो शरीर के हैं,
भगवान आत्मा के (वो) नाम नहीं हैं।

00:15:02.776 --> 00:15:11.023
भगवान का एक नाम है, ज्ञायक।
बस! एक नाम है ज्ञायक।

00:15:11.047 --> 00:15:14.894
मुमुक्षु: पर्याय के नाम हैं।
पर्याय के नाम हैं।
पू. लालचंदभाई: पर्याय के नाम हैं बस।

00:15:14.918 --> 00:15:24.516
हाँ! पर्याय के माध्यम से बहुत नाम आते हैं,
तो विष्णु, ब्रह्मा, शिव बहुत नाम आते हैं।
बहुत नाम आते हैं।

00:15:24.540 --> 00:15:32.939
उनके गुण के माध्यम से
ऐसी (पर्याय) प्रगट हो गयी न? गुण,
अपने गुणों के माध्यम से अनेक नाम कहते हैं।

00:15:32.963 --> 00:15:35.990
कितने नाम तो शरीर के
और कितने गुण के हैं।

00:15:36.014 --> 00:15:38.814
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शिव
- ये अपनी पर्याय है।

00:15:38.838 --> 00:15:42.267
पूर्ण पर्याय हो गई न?
उसका नाम है, पर्याय का नाम है।

00:15:42.291 --> 00:15:49.712
मगर आत्मा का नाम तो एक ज्ञायक है।
एक हजार आठ नाम भी नहीं हैं।

00:15:49.736 --> 00:15:53.592
<b>-इत्यादिरूपसे तीर्थंकर-
आचार्योंकी जो स्तुति है वह
सब ही मिथ्या सिद्ध होती है। </b>

00:15:53.616 --> 00:15:59.765
जो आप ना बोलते हैं कि
देह और आत्मा भिन्न है
तो-तो ये स्तुति झूठी हो जाएगी।

00:15:59.789 --> 00:16:05.350
स्तुति तो झूठी होती नहीं है -
(ऐसा) जिनागम में है, हमने पढ़ा है।

00:16:05.374 --> 00:16:10.001
<b>इसलिये हमारा तो यही एकान्त
निश्चय है कि </b>अज्ञानी दलील करता है

00:16:10.025 --> 00:16:17.739
<b>कि जो आत्मा है वही शरीर है, </b>
आत्मा वो ही शरीर है,
शरीर वो ही आत्मा है।

00:16:17.763 --> 00:16:27.543
शरीर से भिन्न आत्मा हमको दिखने में
आता नहीं है क्योंकि उसके पास
आत्मा को देखने की चक्षु खुली नहीं है।

00:16:27.567 --> 00:16:36.805
वो चक्षु बंद है, बंद है।
तो शरीर को देखनेवाली चक्षु,
ये चर्मचक्षु, इंद्रियज्ञान खुला है।

00:16:36.829 --> 00:16:43.401
तो इंद्रियज्ञान से देखता है,
तो देखते समय उसको भगवान मानता है।
बस!

00:16:43.425 --> 00:16:47.881
<b>शरीर है, पुद्गलद्रव्य है।
इसप्रकार अप्रतिबुद्धने कहा॥२६॥</b>

00:16:47.905 --> 00:16:52.134
यहाँ <b>आचार्यदेव कहते हैं कि
ऐसा नहीं है; </b>ऐसा नहीं है, तू सुन।

00:16:52.158 --> 00:16:58.587
<b>तू नयविभागको नहीं जानता। </b>
यानि व्यवहारनय का कथन क्या
और निश्चयनय का कथन क्या,

00:16:58.611 --> 00:17:01.730
वो दो नय का बँटवारा तेरे पास नहीं है।

00:17:01.754 --> 00:17:07.752
तू सुन! जो सर्वज्ञ भगवान की,
उनकी वाणी में आया है,

00:17:07.776 --> 00:17:14.614
और तीर्थंकर की स्तुति का ज्ञान आता है
मगर वो व्यवहारनय की बात है,
निश्चयनय अलग है।

00:17:14.638 --> 00:17:24.025
ऐसा नय-विभाग तू जानता नहीं (है)।
<b>वह नयविभाग इसप्रकार है
ऐसा गाथा द्वारा कहते हैं :-</b>

00:17:24.049 --> 00:17:31.792
<b>जीव-देह दोनों एक हैं - यह वचन है व्यवहारका;</b>
<b>निश्चयविषैं तो जीव-देह कदापि एक पदार्थ ना ॥२७॥</b>

00:17:31.816 --> 00:17:41.970
एक कदापि हो! कथंचित् नहीं, कदापि।
किसी भी काल में, किसी भी काल में देह
और आत्मा एक होते ही नहीं हैं।

00:17:41.994 --> 00:17:47.436
एक संयोग है और एक स्वभाव है।
स्वभाव के साथ संयोग है;
संयोग की ना नहीं है।

00:17:47.460 --> 00:17:53.767
ये (शरीर) आत्मा के साथ संयोग है
मगर संयोग स्वभाव नहीं होता है
और स्वभाव संयोग नहीं होता है।

00:17:53.791 --> 00:18:01.365
अलग-अलग दो पदार्थ हैं।
संयोग समझे न? कि शक्कर है
शक्कर, तो उसके बोरे में है।

00:18:01.389 --> 00:18:06.694
तो बोरा अलग और शक्कर (अलग),
दो अलग-अलग चीजें हैं।
दो अलग हैं।

00:18:06.718 --> 00:18:09.792
<b>गाथार्थ:- व्यवहारनय तो यह कहता है
कि जीव और शरीर एक ही है; </b>

00:18:09.816 --> 00:18:13.896
व्यवहारनय क्या कहता है?
एक ही बात है, एक है।

00:18:13.920 --> 00:18:18.730
ये (शरीर और चेतन) सब जीव ही हैं,
जीव से भिन्न नहीं है।

00:18:18.754 --> 00:18:27.241
<b>किन्तु निश्चयनयके अभिप्रायसे जीव और
शरीर कभी भी एक पदार्थ नहीं हैं।</b>

00:18:27.265 --> 00:18:36.296
एक वाक्य आज आप लिख लो कि 
निश्चयनय से जितना निरूपण किया 
उसको सत्यार्थ जानकर

00:18:36.320 --> 00:18:42.287
उसका श्रद्धान अंगीकार करना 
और व्यवहारनय से जितना निरूपण आवे

00:18:42.311 --> 00:18:49.260
वो असत्यार्थ जानकर उसका 
श्रद्धान छोड़ देना 
(मोक्षमार्ग प्रकाशक पृष्ठ २५०)

00:18:49.284 --> 00:18:55.927
लिखो! निश्चयनय से... 
लिखवाओ आप बेन, 
लिखवाओ तुम्हारी भाषा में।

00:18:55.951 --> 00:19:28.785
मुमुक्षु: निश्चयनय से जो निरूपण 
करने में आया हो, उसको सत्यार्थ 
जानकर उसका श्रद्धान अंगीकार करना

00:19:28.809 --> 00:20:09.083
और व्यवहारनय के द्वारा जो 
निरूपण करने में आया हो, उसे असत्यार्थ 
जानकर उसका श्रद्धान छोड़ना कि ऐसा नहीं है।

00:20:09.107 --> 00:20:11.656
समझे? 
अब यह गाथा में जो है न...

00:20:11.680 --> 00:20:18.140
पू. लालचंदभाई: इस गाथा में आया न 
कि <b>व्यवहारनय तो यह कहता है 
कि जीव और शरीर एक ही है;</b>

00:20:18.164 --> 00:20:20.300
व्यवहारनय का कथन है।

00:20:20.324 --> 00:20:25.940
व्यवहारनय का कथन है। 
तो ये व्यवहारनय का जो कथन है, 
वो सत्यार्थ है कि असत्यार्थ?

00:20:25.964 --> 00:20:30.229
मुमुक्षु: असत्यार्थ।
पू. लालचंदभाई: तो श्रद्धान छोड़ देना 
(कि) 'ऐसा नहीं है'।

00:20:30.253 --> 00:20:35.069
व्यवहारनय कहता है कि 
देह और आत्मा एक है। 
वो खोटी बात है, झूठी बात है।

00:20:35.093 --> 00:20:39.945
व्यवहारनय झूठी बात करता है 
और निश्चयनय,

00:20:39.969 --> 00:20:45.429
<b>निश्चयनयके अभिप्रायसे जीव और 
शरीर कभी</b> एक नहीं हैं, 
भिन्न-भिन्न हैं। समझे?

00:20:45.453 --> 00:20:51.998
उसका कथन यथार्थ है, 
निश्चयनय का कथन यथार्थ, 
सत्य है तो श्रद्धान ऐसा करना।

00:20:52.022 --> 00:20:58.736
और व्यवहारनय का कथन आवे उसको 
असत्यार्थ जानकर उसका श्रद्धान छोड़ देना।

00:20:58.760 --> 00:21:02.118
श्रद्धा नहीं करना, ज्ञान करना।
मुमुक्षु: ज्ञान करना, 
उसका श्रद्धान नहीं करना।

00:21:02.142 --> 00:21:06.180
पू. लालचंदभाई: (श्रद्धान) नहीं करना।
मुमुक्षु: मात्र जानने के लिए है।

00:21:06.204 --> 00:21:12.416
पू. लालचंदभाई: जानने के लिए है, 
मानने के लिए नहीं है।

00:21:12.440 --> 00:21:17.287
बड़ा पंडित हो जायेगा 
आहिस्ते-आहिस्ते ऐसा लगता है। 
ठीक है!

00:21:17.311 --> 00:21:24.732
धीमे-धीमे समझ में जैसे-जैसे आवे न 
ऐसे आगे बढ़े। अच्छी बात है!

00:21:24.756 --> 00:21:31.220
ऐसे सरल है, सरल है। 
भोला है एकदम।

00:21:31.244 --> 00:21:35.434
मुमुक्षु: इसकी एक शिकायत करनी है। 
पू. लालचंदभाई: अच्छा! शिकायत?
मुमुक्षु: हाँ! मम्मी को करनी है।

00:21:35.458 --> 00:21:39.656
पू. लालचंदभाई: अच्छा! 
करो मेरी हाज़िरी में कर दो।

00:21:39.680 --> 00:21:46.660
मुमुक्षु: कि ये क्या (है) 
ऐसे घर में हँसाने के लिए ही सबको... 
मजाक का इसका बहुत nature (स्वभाव) है,

00:21:46.684 --> 00:21:49.229
बहुत सबको हँसाने का ही 
इसका (स्वभाव है) ऐसा।

00:21:49.253 --> 00:21:56.105
तो ये ऐसी-ऐसी बात करे (तो) 
गुस्सा आ जाता है मम्मी को, ये मेरी 
बहू है, ये मेरा लड़का है, लाओ मेरी है।

00:21:56.129 --> 00:22:01.465
मम्मी कहे है (कि) 
ऐसा मेरा-मेरा क्यों तुम (बोलते हो)? 
बोलने में भी मेरा-मेरा मत बोलो।

00:22:01.489 --> 00:22:04.412
बहुत, ऐसे ज्यादा मेरा-मेरा करता है।

00:22:04.436 --> 00:22:10.287
मुमुक्षु: हम ये मालूम करते हैं कि 
ये इसके उत्तर में ये क्या बोलते हैं? 
उसको सुनने की जिज्ञासा होती है।

00:22:10.311 --> 00:22:19.860
ऐसे नहीं बोलता 
लेकिन (हम) ऐसे कर-करके बुलवाते हैं। 
हाँ! ये ही बात है।

00:22:19.884 --> 00:22:23.816
पू. लालचंदभाई: ऐसी भाषा! 
भाषा विपरीत नहीं बोलना।

00:22:23.840 --> 00:22:28.292
भाषा विपरीत बोलने से क्या होगा 
कि भाव ऐसा (विपरीत) हो जाएगा,

00:22:28.316 --> 00:22:29.927
आहिस्ते-आहिस्ते।
मुमुक्षु: भाव तो विपरीत है ही अनादि से।

00:22:29.951 --> 00:22:32.652
पू. लालचंदभाई: हाँ! 
अनादि से है ही भाव विपरीत। 
मुमुक्षु: और ऐसी ही भाषा बोलो...?

00:22:32.676 --> 00:22:38.114
पू. लालचंदभाई: अरे! 
भाषा को सुल्टा करो, 
भाव बाद में सुल्टेगा।

00:22:38.138 --> 00:22:42.532
मुमुक्षु: भाई! जब कोई नाटक होता है, 
नाटक। तो उसमें जो है...

00:22:42.556 --> 00:22:44.745
पू. लालचंदभाई: मेरा घर है, 
मेरी बहू है बोलना ही नहीं।

00:22:44.769 --> 00:22:50.869
मुमुक्षु: मेरी बहू बहुत अच्छी है। 
मेरा बबलू बहुत अच्छा है। 
मेरा बेटा, मेरा बेटा, ऐसे-ऐसे बोलते हैं।

00:22:50.893 --> 00:22:55.616
पू. लालचंदभाई: भाषा बराबर (नहीं), 
सुधार लो अभी। 
वो कांताबेन की शिकायत (सही है)।

00:22:55.640 --> 00:22:58.572
आपके हित के लिए है न? 
दूसरा तो कुछ है नहीं।

00:22:58.596 --> 00:23:01.380
मुमुक्षु: ऐसी भाषा भी नहीं बोलनी चाहिए। 
पू. लालचंदभाई: भाषा नहीं बोलना चाहिए।

00:23:01.404 --> 00:23:06.576
मुमुक्षु: मनोरंजन हो जाता है। 
ये लोग बोलते हैं, तो उसमें ऐसे...
मुमुक्षु: नहीं ऐसे नहीं।

00:23:06.600 --> 00:23:11.656
पू. लालचंदभाई: मनोरंजन का 
दूसरा तरीका करो, बस। 
मेरा-मेरा नहीं करना।

00:23:11.680 --> 00:23:18.260
मेरा-मेरा करने से श्रद्धा बन जाती है। 
श्रद्धा तो है ही, वो श्रद्धा दृढ़ होती है। 
फायदा नहीं है।

00:23:18.284 --> 00:23:21.194
मुमुक्षु: नहीं करेंगे। 
पू. लालचंदभाई: विपरीत वचन नहीं करना।

00:23:21.218 --> 00:23:26.336
बस! हो गया, हो गया अच्छा। 
ऐसा कर (हाथ जोड़) दिया न।

00:23:26.360 --> 00:23:32.363
<b>जैसे इस लोक में</b> 
ये जो जगत है जगत, उसमें 
<b>सोने और चाँदी </b>

00:23:32.387 --> 00:23:41.207
सोना और रूपा (चाँदी) - उस
<b>को गलाकर एक कर देनेसे एकपिण्डका 
व्यवहार होता है </b>एक पिंड बन जाता है।

00:23:41.231 --> 00:23:47.047
सोना और चाँदी गलाकर 
एक पिंड हो जाता है।

00:23:47.071 --> 00:23:55.647
<b>उसीप्रकार आत्मा और शरीरकी 
परस्पर एक क्षेत्रमें रहनेकी अवस्था होनेसे </b>

00:23:55.671 --> 00:24:03.354
एक आकाश के क्षेत्र में दो रहते हैं। 
आत्मा के क्षेत्र में शरीर नहीं है 
और शरीर के क्षेत्र में आत्मा नहीं (है)।

00:24:03.378 --> 00:24:09.976
आकाश के क्षेत्र में दो मिलते हैं। 
आकाश है न, 
उसमें दो पदार्थ मिलकर रहते हैं साथ में।

00:24:10.000 --> 00:24:14.176
<b>होनेसे एकपनेका व्यवहार होता है। </b>
एक है।

00:24:14.200 --> 00:24:19.660
जैसे सोना और चाँदी मिलान किया तो 
एक गट्ठा (पिंड) हो गया, लट्ठा (पिंड) हो गए।

00:24:19.684 --> 00:24:21.820
तो यह सोना है, 
ऐसा कहने में आता है।

00:24:21.844 --> 00:24:29.576
ऐसे ये शरीर और आत्मा 
अनादिकाल से एक गट्ठा हो गए हैं 
तो ऐसा कहने में आता है कि देह है

00:24:29.600 --> 00:24:33.683
वो जीव है, मनुष्य जीव है 
- ऐसा कहने में आता है।

00:24:33.707 --> 00:24:40.287
जैसे सोना और चाँदी (मिला दिया) 
तो सोना है ऐसा कहने में आता है, 
मगर सोना अलग है और चाँदी अलग है।

00:24:40.311 --> 00:24:47.340
ऐसा कहने में आता है कि जीव है, 
ये मनुष्य जीव है, देव जीव है, नारकी जीव 
है, तिर्यंच जीव है, ऐसा कहने में आता है।

00:24:47.364 --> 00:24:55.096
मगर भिन्न-भिन्न हैं, ये व्यवहार है। 
ऐसा व्यवहार से कहा जाता (है), 
कथनमात्र है।

00:24:55.120 --> 00:24:59.785
जैसा कथन है 
वैसा भाव नहीं समझना।

00:24:59.809 --> 00:25:03.283
मुमुक्षु: कथन कहने के लिए है बस, 
ऐसे तो अलग-अलग हैं दोनों।

00:25:03.307 --> 00:25:09.140
पू. लालचंदभाई: कहने के लिए एक हैं। 
सोना और चाँदी का पिंड सोना, 
सफेद सोना ऐसा कहने में आता है।

00:25:09.164 --> 00:25:15.354
ऐसे ये देह और आत्मा हैं तो 
अलग-अलग, अलग चीज हैं 
मगर एक क्षेत्र में उसका पिंड है न अभी,

00:25:15.378 --> 00:25:22.874
साथ में रहते हैं न तो कहने में आता है 
कि ये जीव है। एकेन्द्रिय जीव, 
दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय जीव है, जीव है।

00:25:22.898 --> 00:25:28.985
शरीर का जीव, शरीर का नाम; 
शरीर, नाम तो शरीर का है। 
एकेन्द्रिय आदि द्रव्येन्द्रिय हैं।

00:25:29.009 --> 00:25:32.980
मुमुक्षु: और नाम लेता है जीव। 
पू. लालचंदभाई: हाँ! और भावेन्द्रिय भी है। 
वो सब जीव से अलग हैं।

00:25:33.004 --> 00:25:37.372
मुमुक्षु: षट्काय का जीव। 
पू. लालचंदभाई: कहा जाता है बस, 
कहा जाता है।

00:25:37.396 --> 00:25:47.105
मुमुक्षु: कहने के लिए (है)। 
पू. लालचंदभाई: कहने के लिए है, 
मानने के लिए नहीं।

00:25:47.129 --> 00:25:51.318
<b>एकपनेका व्यवहार होता है। </b>
शब्द कैसा इस्तेमाल किया है?

00:25:51.342 --> 00:25:59.216
कि देह और आत्मा एक है, 
ऐसे देह को जीव कहना ऐसा व्यवहार है। 
आहाहा!

00:25:59.240 --> 00:26:06.109
मुमुक्षु: ऐसा निश्चय नहीं है। 
पू. लालचंदभाई: (निश्चय नहीं है।) 
ये दाल की दुकान रवींद्र भैया की है,

00:26:06.133 --> 00:26:08.892
तो निश्चय है कि व्यवहार? 
मुमुक्षु: व्यवहार।

00:26:08.916 --> 00:26:12.007
पू. लालचंदभाई: व्यवहार झूठा कि सच्चा? 
मुमुक्षु: झूठा।
पू. लालचंदभाई: बस!

00:26:12.031 --> 00:26:14.336
 मुमुक्षु: (दुकान मेरी) है ही नहीं। 
पू. लालचंदभाई: है ही नहीं। 
आप मालिक नहीं हैं।

00:26:14.360 --> 00:26:20.180
ये तो पुद्गल मालिक है, उसकी, दुकान का। 
और मकान बनाया नया उसका मालिक (कौन)? 
मुमुक्षु: उसका मालिक भी पुद्गल ही है।

00:26:20.204 --> 00:26:24.554
पू. लालचंदभाई: पुद्गल! बबलू भी नहीं?
मुमुक्षु: कोई नहीं है मालिक उसका।
पू. लालचंदभाई: अच्छा! अच्छा!

00:26:24.578 --> 00:26:27.443
मुमुक्षु: कोई नहीं (ऐसा नहीं) कहना। 
पुद्गल है उसका मालिक।

00:26:27.467 --> 00:26:33.958
पू. लालचंदभाई: हम नहीं हैं (मालिक), 
हम नहीं हैं। 
मुमुक्षु: पुद्गल ही मालिक है।

00:26:33.982 --> 00:26:36.923
अभी आयु कर्म पूरा हो जाए 
तो छोड़कर चले जायें। 
(यदि) मालिक हो तो साथ (में) ले जायें।

00:26:36.947 --> 00:26:41.780
पू. लालचंदभाई: साथ ले जायें। हाँ! 
इसलिए मेरा नहीं है। 
मेरा-मेरा बोलना भी नहीं।

00:26:41.804 --> 00:26:47.469
मुमुक्षु: अब नहीं बोलेंगे। 
पू. लालचंदभाई: अभी नहीं बोलेंगे, 
अच्छी बात है!

00:26:47.493 --> 00:26:52.545
<b>एकपनेका व्यवहार</b>, 
ये कथनमात्र, कहने के लिए (है) बस। 
ऐसा मानना नहीं।

00:26:52.569 --> 00:27:01.887
जैसा कहता है, व्यवहारनय कहता है 
कि देह आत्मा है ऐसा मानना नहीं, 
जानना बस। जाना कहने में आता है।

00:27:01.911 --> 00:27:09.376
<b>यों व्यवहारमात्रसे </b>
देखो कितना खुलासा करते हैं। 
<b>यों व्यवहारमात्रसे ही</b>,

00:27:09.400 --> 00:27:18.514
व्यवहार से नहीं, व्यवहारमात्र से ही, 
<b>आत्मा और शरीरका एकपना है, </b>
आहाहा!

00:27:18.538 --> 00:27:27.185
इस व्यवहार को ही निश्चय माना है, मर गया। 
व्यवहार का कथन झूठा है, 
उसको सच्चा मान लिया है, बस।

00:27:27.209 --> 00:27:31.105
मुमुक्षु: वो ही संसार का कारण है। 
पू. लालचंदभाई: वो ही संसार का कारण है।

00:27:31.129 --> 00:27:39.558
<b>परन्तु निश्चयसे एकपना नहीं है;</b>...
मुमुक्षु: नहीं है, 
निश्चय से एकपना है ही नहीं।

00:27:39.582 --> 00:27:43.043
पू. लालचंदभाई: है ही नहीं; 
भिन्न-भिन्न हैं। 
मुमुक्षु: बिल्कुल।

00:27:43.067 --> 00:27:49.460
पू. लालचंदभाई: जो भिन्न-भिन्न न हो 
तो शरीर को तो जला देते हैं इधर, 
तो आत्मा भी जलना चाहिए (अगर) एक हो तो।

00:27:49.484 --> 00:27:55.687
तो आत्मा तो मरता नहीं है। 
आत्मा तो निकल जाता है वहाँ से, 
तो एक नहीं है।

00:27:55.711 --> 00:28:03.665
ऐसा विचार करो न, 
तो भी काम हो जाता है कि शरीर को 
जलाते हैं, आप बहुत जगह पर जाते हैं,

00:28:03.689 --> 00:28:08.798
शरीर तो जलता है 
और आत्मा तो निकल गया उसका। 
शरीर और आत्मा एक नहीं हैं।

00:28:08.822 --> 00:28:14.563
उसकी तो राख हो जाती है, 
धूल।

00:28:14.587 --> 00:28:18.687
<b>परन्तु निश्चयसे एकपना नहीं है; 
क्योंकि निश्चयसे देखा जाये तो,</b>

00:28:18.711 --> 00:28:30.949
<b>जैसे पीलापन आदि और सफेदी आदि जिनका 
स्वभाव है ऐसे सोने और चांदीमें अत्यन्त 
भिन्नता होनेसे</b> देखो! सर्वथा भिन्नपना बताया।

00:28:30.973 --> 00:28:36.292
मुमुक्षु: अत्यंत भिन्न हैं।
पू. लालचंदभाई: अत्यंत भिन्न हैं। 
सोना और चाँदी सर्वथा भिन्न (हैं)। हाँ!

00:28:36.316 --> 00:28:42.887
<b>उनमें एकपदार्थपनेकी असिद्धि है, </b>
यानि एक पदार्थ नहीं है। 
सोना भिन्न, चाँदी भिन्न, अलग-अलग हैं।

00:28:42.911 --> 00:28:47.496
<b>इसलिए अनेकत्व ही है, </b>
एकपना नहीं है, अनेकपना है।

00:28:47.520 --> 00:28:55.092
<b>इसीप्रकार उपयोग और अनुपयोग</b>, 
उपयोग जिसका लक्षण है (वो) आत्मा है,

00:28:55.116 --> 00:29:00.585
और जिसमें अनुपयोग लक्षण है 
(अर्थात्) उपयोग लक्षण नहीं है 
वो जड़ है, पुद्गल है।

00:29:00.609 --> 00:29:07.563
<b>उपयोग और अनुपयोग 
जिनका स्वभाव है ऐसे आत्मा 
और शरीरमें अत्यन्त भिन्नता </b>

00:29:07.587 --> 00:29:11.629
सर्वथा भिन्नपना <b>होनेसे </b>
आहाहा! अत्यंत भिन्न हैं।

00:29:11.653 --> 00:29:18.838
जैसे शरीर अत्यंत भिन्न है, 
ऐसे कर्म अत्यंत भिन्न हैं, 
ऐसे रागादि अत्यंत भिन्न हैं।

00:29:18.862 --> 00:29:24.207
वो पूजा का भाव कथंचित् भिन्न 
कि सर्वथा भिन्न, पूजा का भाव?
मुमुक्षु: सर्वथा भिन्न।

00:29:24.231 --> 00:29:30.429
पू. लालचंदभाई: तो सर्वथा भिन्न है, 
उसका कर्ता आत्मा बन सकता है ?
मुमुक्षु: नहीं।

00:29:30.453 --> 00:29:37.616
पू. लालचंदभाई: तो पूजा किसने की?
मुमुक्षु: वो तो जड़ की क्रिया है, 
जड़ में होती है।

00:29:37.640 --> 00:29:46.589
पू. लालचंदभाई: ये शुभभाव हुआ, 
वो शुभभाव अत्यंत भिन्न है 
कि कथंचित् भिन्न है?

00:29:46.613 --> 00:29:50.514
मुमुक्षु: शुभभाव अत्यंत भिन्न है।
पू. लालचंदभाई: अत्यंत भिन्न है।

00:29:50.538 --> 00:29:55.292
अत्यंत भिन्न है 
तो उसके कर्ता आप बन सकते हैं?
मुमुक्षु: नहीं।

00:29:55.316 --> 00:30:01.794
जो भिन्न है उसका कर्ता कैसे बन जाएँगे? 
पू. लालचंदभाई: तो शुभभाव किसने किया? 
कि शुभभाव पर्याय ने किया।

00:30:01.818 --> 00:30:08.176
और मैंने क्या किया? 
कि पर्याय ने शुभभाव किया 
ऐसा मैंने जाना

00:30:08.200 --> 00:30:17.038
और जानते-जानते मेरे आत्मा को जाना 
वो ज्ञान मेरा कर्म है, 
राग मेरा कर्म नहीं है।

00:30:17.062 --> 00:30:18.798
सुनिये! फिर से।

00:30:18.822 --> 00:30:22.989
शुभभाव आया। हें? 
भगवान की पूजा का, 
वंदन का भाव आता है। ठीक है!

00:30:23.013 --> 00:30:29.429
उसके काल-क्रम में परिणाम आता है 
मगर परिणाम का कर्ता परिणाम है।

00:30:29.453 --> 00:30:40.976
कर्म से भी नहीं और आत्मा से भी नहीं, 
अपनी योग्यता से इस पर्याय का कर्ता 
पर्याय है और राग पर्याय के साथ तन्मय है।

00:30:41.000 --> 00:30:45.576
राग आया न, 
वो पर्याय के साथ तन्मय है, 
मेरे साथ तन्मय नहीं है;

00:30:45.600 --> 00:30:50.132
इसलिए मेरे से भिन्न है, 
इसलिए मैं उसका कर्ता नहीं हूँ।

00:30:50.156 --> 00:30:59.776
तो मैं कौन हूँ? कि जाना कि ये 
पर्याय का कर्ता पर्याय है, ऐसा जाना न? 
ऐसा जाना तो (अब) जाननहार को जानो।

00:30:59.800 --> 00:31:05.367
वहाँ भी जानने में रुकना नहीं, 
जाननहार को जानो 
तो ज्ञान कर्म हो जाता है।

00:31:05.391 --> 00:31:12.158
राग कर्म नहीं बनता है, 
राग को जाननेवाला ज्ञान भी कर्म नहीं बनेगा।

00:31:12.182 --> 00:31:15.954
वहाँ से छूटना 
कि राग का कर्ता मैं नहीं हूँ, 
राग का कर्ता राग है।

00:31:15.978 --> 00:31:21.678
अच्छा, (अब) आगे? 
राग को मैं जाननेवाला हूँ, 
थोड़ी देर के लिए करनेवाला नहीं हूँ।

00:31:21.702 --> 00:31:28.394
बाद में उसको भी जाननेवाला मैं नहीं हूँ। 
(राग को भी जाननेवाला मैं) नहीं हूँ।

00:31:28.418 --> 00:31:39.203
मैं तो जाननहार को जानता हूँ 
तो अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होकर 
अनुभव हो जायेगा। ये कला है।

00:31:39.227 --> 00:31:45.972
मुमुक्षु: अगर राग को ही 
 जाननेवाला मैं बनूँ (तो)?
पू. लालचंदभाई: वो अज्ञान है।

00:31:45.996 --> 00:31:52.754
कल बताया था कि पहले तो 
आपने कहा कि राग का ज्ञाता है, 
कर्ता नहीं (है, ऐसा) पहला पाठ था।

00:31:52.778 --> 00:32:09.900
अभी दूसरा पाठ ले जाओ 
कि राग का मैं ज्ञाता भी नहीं हूँ, 
मैं तो ज्ञायक का ज्ञाता हूँ। आहाहा!

00:32:09.924 --> 00:32:15.087
क्योंकि जड़ को जानते-जानते 
चेतन जानने में नहीं आएगा। 
राग जड़ है।

00:32:15.111 --> 00:32:18.905
उसको जानते-जानते उपयोग 
आत्मा में नहीं आएगा।

00:32:18.929 --> 00:32:21.798
उसका निषेध करना पड़ेगा कि 
राग का जाननेवाला मैं नहीं हूँ।

00:32:21.822 --> 00:32:26.460
कल दो बात आयीं थी, चार बात! 
कल चार बात आयीं थी।

00:32:26.484 --> 00:32:46.385
कर्ताबुद्धि, कर्ता का व्यवहार, 
ज्ञाताबुद्धि (और) ज्ञाता का व्यवहार। 
लिखा था न कल? अच्छा!

00:32:46.409 --> 00:32:52.425
राग का मैं कर्ता तो नहीं हूँ 
मगर राग का ज्ञाता भी नहीं हूँ।

00:32:52.449 --> 00:32:59.345
मुमुक्षु: कर्तापना तो छूट जाता है 
लेकिन ज्ञातापना बाकी रहता है।
पू. लालचंदभाई: बात सत्य है!

00:32:59.369 --> 00:33:03.794
वो ज़रा ज्यादा पुरुषार्थ माँगे उसमें।

00:33:03.818 --> 00:33:11.256
कर्ता तो छूट जाता है कि 
पर्याय का कर्ता पर्याय है, मैं तो नहीं हूँ 
उसका (कर्ता), मैं तो उसको जाननेवाला हूँ।

00:33:11.280 --> 00:33:21.069
ज्ञान में आ गया, वो ज्ञान में आ गया। 
कर्ताबुद्धि तो गल गई यानि मिथ्यात्व तो गला। 
कर्ताबुद्धि गली तो टल जायेगी।

00:33:21.093 --> 00:33:27.509
अभी एक point (बिन्दु) है कि मैं, 
उसको जानते-जानते 
मेरा आत्मा जानने में नहीं आएगा।

00:33:27.533 --> 00:33:34.265
राग को जानने में रुक जाऊँ मैं (कि) 
ये राग है, राग है, राग है तो ज्ञायक 
कब (जानने) में आएगा? नहीं आएगा।

00:33:34.289 --> 00:33:41.883
तो अभी राग को जानने का बंद कर दो 
कि मेरे ज्ञान में 
ज्ञायक ही जानने में आ रहा है।

00:33:41.907 --> 00:33:50.838
राग को मैं जानता नहीं हूँ, 
दुःख को जानता नहीं हूँ, आकुलता 
होती है तो उसको भोगनेवाला तो नहीं;

00:33:50.862 --> 00:33:58.380
नींद उड़ जाए रात में, 
आकुलता में तो उसको भोगनेवाला तो नहीं 
मगर उसको जाननेवाला भी (मैं) नहीं हूँ।

00:33:58.404 --> 00:34:09.056
मैं तो जाननहार को जानता हूँ। 
बस!

00:34:09.080 --> 00:34:12.500
थोड़ा कठिन तो है मगर 
ऐसा (इतना) कठिन नहीं है।

00:34:12.524 --> 00:34:16.696
अशक्य नहीं है, आ जाएगा। 
आ जाएगा, ऐसा बोलते हैं।

00:34:16.720 --> 00:34:20.363
मुमुक्षु: ये कहते हैं न कि 
ऐसा अनुभव जल्दी हो जाये।

00:34:20.387 --> 00:34:23.376
मुमुक्षु: मार्गदर्शन मिलता है 
तो फिर अटक छूटती है। 
पू. लालचंदभाई: हाँ! अटक छूटती है।

00:34:23.400 --> 00:34:26.838
मुमुक्षु: और वो मार्गदर्शन नहीं मिलता है 
अटकन में क्या सोचे?

00:34:26.862 --> 00:34:32.652
पू. लालचंदभाई: ऐसा एक मोरबी के 
पास छोटा गाँव था, मोरबी।

00:34:32.676 --> 00:34:39.216
तो ववाणीया, 
श्रीमद्जी का आश्रम है न, वहाँ उसके पास है। 
तो उसके पास छोटा गाँव था एकदम।

00:34:39.240 --> 00:34:45.638
तो उसका पटेल वेदांती था, 
बाद में जैनदर्शन को अपना लिया 
एक भाई के परिचय से।

00:34:45.662 --> 00:34:50.607
तो उसको राग का कर्तापना छूट गया 
कि राग का कर्ता नहीं हूँ।

00:34:50.631 --> 00:34:55.429
राग का मैं जाननेवाला हूँ, ज्ञाता हूँ, 
करनेवाला नहीं हूँ।

00:34:55.453 --> 00:35:01.625
तो उसको खटक हुई कि 
अभी तो अनुभव तो होता नहीं है 
तो गुरुदेव तो चले गए, अभी क्या करें?

00:35:01.649 --> 00:35:04.194
उस time (दफे) में मैं मोरबी गया।

00:35:04.218 --> 00:35:10.874
तो वहाँ से वो (उस) गाँव से चर्चा में आए। 
चर्चा में आने से उसने पूछा कि भाई साहब!

00:35:10.898 --> 00:35:17.927
राग का कर्ता तो छूट गया है, 
मैं तो ज्ञानवाला हूँ, जाननेवाला हूँ, 
करनेवाला नहीं हूँ।

00:35:17.951 --> 00:35:26.038
तो अभी काम नहीं बनता है। 
तो क्या उसमें क्षति, खामी (कमी), 
भूल क्या रह गई?

00:35:26.062 --> 00:35:29.132
क्या भूल है? 
कोई भूल को बताओ आप।

00:35:29.156 --> 00:35:32.789
मैंने कहा 
कि राग को जानने का तो बंद कर दो।

00:35:32.813 --> 00:35:41.878
करने का तो बंद किया 
(अब) जानना बंद करो। 
मैं तो ज्ञान को जानता हूँ।

00:35:41.902 --> 00:35:48.096
ज्ञान को ही नहीं, ज्ञायक को जानता हूँ। 
पहले ज्ञान में आओ 
(कि) ज्ञान जानने में आता है।

00:35:48.120 --> 00:35:58.016
ज्ञान के बाद ज्ञायक जानने में आता है। 
वहाँ आ जाओ तो काम हो जाएगा। 
बस!

00:35:58.040 --> 00:36:11.265
अभी तो आपको सत्समागम मिलनेवाला है 
दो दिन के बाद। वो सब बतायेगी।

00:36:11.289 --> 00:36:17.469
जैसे हम पाँच महीने साथ में रहे न, 
उसमें बहुत-बहुत चर्चा होती थी।

00:36:17.493 --> 00:36:23.292
उसमें जो माल-माल होगा वो 
आपको बादाम का मैसूब (मसूरपाक)... 
हें?

00:36:23.316 --> 00:36:31.287
मम्मी-पापा को तो देगी न? हें? 
अकेली खानेवाली नहीं है वो, 
सबको खिलाती है। इधर तो खिलाती है।

00:36:31.311 --> 00:36:46.865
मुमुक्षु: उधर भी खिलायेगी।
पू. लालचंदभाई: खिलायेगी? अच्छा!

00:36:46.889 --> 00:36:54.905
अच्छा! <b>इसीप्रकार उपयोग 
और अनुपयोग जिनका स्वभाव है 
ऐसे आत्मा और शरीर </b>अलग-अलग हैं।

00:36:54.929 --> 00:37:00.892
आत्मा का लक्षण उपयोग है 
और शरीर का लक्षण अनुपयोग है 
यानि जड़ है, जड़ है।

00:37:00.916 --> 00:37:07.052
उपयोग, 
जानन-क्रिया शरीर में होती नहीं है। 
ये जानन-क्रिया उसमें नहीं है। अच्छा!

00:37:07.076 --> 00:37:09.016
इसमें (घड़ी में) जानन-क्रिया तो नहीं है।

00:37:09.040 --> 00:37:14.869
इसमें (घड़ी में) तो नहीं है, 
ये तो pure (शुद्ध) जड़ है 
मगर वो (शरीर) तो मिश्र-जड़ है।

00:37:14.893 --> 00:37:21.349
मुमुक्षु: हें?
पू. लालचंदभाई: ये (घड़ी) 
तो pure (शुद्ध) जड़ है,

00:37:21.373 --> 00:37:27.007
उसके साथ तो जीव का संबंध नहीं है मगर 
इसके (शरीर के) साथ तो जीव का संबंध है।

00:37:27.031 --> 00:37:33.376
तो वो (शरीर) तो थोड़ा तो जाने न, 
५० टका (प्रतिशत)? ५० प्रतिशत जीव जाने 
और ५० प्रतिशत (शरीर जाने)?

00:37:33.400 --> 00:37:38.780
मुमुक्षु: १०० प्रतिशत भी नहीं जानता है ये।
पू. लालचंदभाई: नहीं जानता है? 
हाँ! (शरीर) जड़, pure जड़ है।

00:37:38.804 --> 00:37:52.407
हाँ! ये (घड़ी) जड़ है ऐसा जड़ है। 
यह तो lesson (पाठ) 
पक्का कराने के लिए (है)। समझे?

00:37:52.431 --> 00:38:00.158
<b>अत्यन्त भिन्नता </b>आहाहा! 
सर्वथा भिन्नपना <b>होने से </b>इसमें 
राग, कर्म सब आ गया, शरीर के साथ।

00:38:00.182 --> 00:38:07.878
शरीर के साथ सब ले लेना। 
<b>एकपदार्थपनेकी असिद्धि है, इसलिये 
अनेकत्व ही है। ऐसा यह प्रगट नयविभाग है। </b>

00:38:07.902 --> 00:38:12.207
अनेक है, 
शरीर और आत्मा एक नहीं है, 
अनेकपना है, भिन्न-भिन्न हैं।

00:38:12.231 --> 00:38:16.496
एक में उपयोग लक्षण है, जानन-क्रिया; 
उसमें (दूसरे में) जानन-क्रिया नहीं है।

00:38:16.520 --> 00:38:25.696
जिसमें जानन-क्रिया नहीं है, 
ये अनात्मा है, पुद्गल है, जड़ है, 
शरीर है, पर है - बस, ऐसा ले लेना।

00:38:25.720 --> 00:38:30.238
<b>इसलिये व्यवहारनयसे ही शरीरके 
स्तवनसे आत्माका स्तवन होता है।</b>

00:38:30.262 --> 00:38:35.576
<b>भावार्थ :- व्यवहारनय तो 
आत्मा और शरीरको एक कहता है</b>, 
व्यवहरानय क्या कहता है?

00:38:35.600 --> 00:38:40.856
कि आत्मा और शरीर एक ही है। 
झूठी बात करता है व्यवहारनय। 
ख्याल रखना!

00:38:40.880 --> 00:38:46.856
और झूठी बात जो करे 
तो आप फँस जायेंगे व्यापार में भी।

00:38:46.880 --> 00:38:54.589
बहुत लोग व्यापार में आकर ठगते हैं, 
माल बतावें 'अच्छा माल है'। संभलना!

00:38:54.613 --> 00:38:59.994
व्यवहारनय का कथन वो भूल भरा है। 
व्यवहारनय तो आत्मा और शरीर को एक कहता है।

00:39:00.018 --> 00:39:07.554
व्यवहारनय भी सर्वज्ञ भगवान की वाणी 
में आया है, संयोग का ज्ञान कराने के 
लिए, श्रद्धा कराने के लिए नहीं है।

00:39:07.578 --> 00:39:17.043
ज्ञान कराने के लिए है व्यवहार, 
श्रद्धा कराने के लिए नहीं है। 
श्रद्धा के काबिल नहीं है।

00:39:17.067 --> 00:39:27.700
आत्मा को जानने के बाद जानने के काबिल है, 
थोड़ी देर के लिए।

00:39:27.724 --> 00:39:35.256
मुमुक्षु: शरीर और आत्मा को 
एक नहीं मानेंगे व्यवहारनय से 
तो उसमें तो फिर एकांत...

00:39:35.280 --> 00:39:38.745
पू. लालचंदभाई: फिर जैसे राख को मसलता है 
और पाप नहीं लगता (समयसार गाथा ४६),

00:39:38.769 --> 00:39:42.683
ऐसे एक इंद्रिय, 
दो इंद्रिय जीव को मसलने से पाप 
नहीं लगता है (-जीव ऐसा न मान ले)

00:39:42.707 --> 00:39:51.256
इसलिए ये व्यवहारनय से जानने योग्य है 
कि अभी ये पुद्गल के साथ जीव का संयोग है

00:39:51.280 --> 00:39:56.203
तो उसको मारना नहीं है; 
मारने से पाप लगेगा - ऐसा।

00:39:56.227 --> 00:40:06.189
वो पाप की निवृत्ति के लिए व्यवहारनय है 
और पुण्य की एकत्वबुद्धि 
छोड़ने के लिए निश्चय(नय) है।

00:40:06.213 --> 00:40:11.376
इतना है कि ऐसा जाने 
कि एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, 
तीन इंद्रिय जीव है,

00:40:11.400 --> 00:40:15.443
तो (चार हाथ जमीन) 
देखकर (छहढाला ढाल ६, गाथा २) 
चलते हैं न मुनिराज भी। हें?

00:40:15.467 --> 00:40:21.967
तो उसको वो ख्याल है कि 
ये जो शरीर है उससे जीव भिन्न है, 
तो भी शरीर का संयोग है

00:40:21.991 --> 00:40:31.878
इसलिए अपने को संभलकर चलना चाहिए। 
इतना उसको लाभ होता है कि पाप से 
बचता है और पुण्य की प्रवृत्ति में आता है।

00:40:31.902 --> 00:40:41.558
बस, इतना ही। 
पाप से बच जाता है ऐसा समझने से, 
मगर उसमें एकत्वबुद्धि कर लेता है।

00:40:41.582 --> 00:40:48.674
मुमुक्षु: बस! यही खतरा है। 
पू. लालचंदभाई: ये खतरा है बड़ा 
और कोई तकलीफ नहीं है।

00:40:48.698 --> 00:40:57.238
आपका प्रश्न वो ही था न? 
हाँ! समझ गया मैं। 
देवलाली में हुआ था।

00:40:57.262 --> 00:41:06.052
व्यवहारनय से होता है, निश्चयनय से नहीं।
मुमुक्षु: बस! समझ में आ गया। 
पू. लालचंदभाई: आ गया सब? अच्छा!

00:41:06.076 --> 00:41:13.505
देवलाली में एक विचार आया कि 
ये लड़की हमारे इधर आई 'पुद्गल का परिणाम, 
पुद्गल का परिणाम, पुद्गल का परिणाम' ये क्या है?

00:41:13.529 --> 00:41:17.247
उसको (बेन के पिताजी को) 
ऐसी घबराहट हो गई।

00:41:17.271 --> 00:41:26.007
तो बेन आये मेरे पास कि मेरे पिताजी 
की शंका-आशंका का समाधान करो। 
आओ! खुशी से आओ। सभी बातों का फैसला है।

00:41:26.031 --> 00:41:34.118
व्यवहारनय से कहा जाता है। 
पर्याय में राग होने से वो जीव का भाव है 
(ऐसा) व्यवहारनय से कहा जाता है।

00:41:34.142 --> 00:41:37.109
है पर्याय में राग, जीव में तो नहीं है।

00:41:37.133 --> 00:41:42.874
जीव में तो ज्ञान होता है और बाजू में, 
पड़ोस में, 
साथ में राग भी होता है पर्याय में,

00:41:42.898 --> 00:41:47.718
तो कहा जाता है कि 'रागी जीव' - 
तो (ये) व्यवहारनय का कथन है।

00:41:47.742 --> 00:41:54.718
ऐसा सत्यार्थ मानना तो राग 
और आत्मा एक हो जाएगा। 
ज्ञानमय है और रागमय नहीं है।

00:41:54.742 --> 00:42:02.434
बार-बार विचार करने जैसी बात है! 
समय-समय पर भूला है 
तो समय-समय पर सावधान रहो।

00:42:02.458 --> 00:42:09.758
समय-समय पर भूलता है 
तो समय-समय पर सावधान रहो कि 
राग और आत्मा कदापि एक नहीं हैं!

00:42:09.782 --> 00:42:21.420
राग जड़ है (और) आत्मा चेतन है। 
ऐसे देह जड़ है और आत्मा चेतन है।

00:42:21.444 --> 00:42:25.229
<b>व्यवहारनय तो आत्मा और शरीरको 
एक कहता है और निश्चयनय भिन्न कहता है।</b>

00:42:25.253 --> 00:42:30.145
<b>इसलिये व्यवहारनयसे शरीरका स्तवन 
करनेसे आत्माका स्तवन माना जाता है॥२७॥ </b>

00:42:30.169 --> 00:42:36.732
व्यवहारनय से कहा जाता है कि 
शरीर का स्तवन करने से भगवान 
का स्तवन हो गया - ऐसा कहा जाता है।

00:42:36.756 --> 00:42:43.834
बाकी सचमुच तो शुभभाव हुआ और 
एक माना तो मिथ्यात्व साथ में हुआ।

00:42:43.858 --> 00:42:50.074
क्या कहा? शुभभाव तो हुआ 
और साथ में मिथ्यात्व हो गया।

00:42:50.098 --> 00:42:56.794
ऐसे दूसरे जीव को बचाने जाओ आप, 
तो आपको ऐसा लगे कि मैंने बचाया।

00:42:56.818 --> 00:43:03.612
तो बचाया, तो करुणा आई 
तो शुभभाव तो हुआ मगर मैंने बचाया 
(ये) मिथ्यात्व हो गया। मिथ्यात्व हो गया।

00:43:03.636 --> 00:43:05.923
मुमुक्षु: शुभ के साथ ही 
मिथ्यात्व कर लेता है। हाँ! बिल्कुल।

00:43:05.947 --> 00:43:15.038
शुभ के साथ एकत्व करके 
मिथ्यात्व कर लेता है। 
स्वयं से बचा, हमने कहाँ बचाया?

00:43:15.062 --> 00:43:20.816
पू. लालचंदभाई: इस time (दफा) में, 
इस time में कांताबेन का ज़रा थोड़ा...
नहीं! थोड़ा ठीक है।

00:43:20.840 --> 00:43:24.932
नहीं तो पहले समय में (पिछली बार) तो आप, 
आपको कुछ दिमाग में (समझ) नहीं आता था।

00:43:24.956 --> 00:43:35.803
अभी अभ्यास करने से, 
हाँ! विकास थोड़ा होता है। 
ज्ञान का विकास होता है धीमे-धीमे।

00:43:35.827 --> 00:43:40.323
कोई सीखकर आया नहीं (है)। 
हमारे देश में कहीं कोई सीखकर आया 
नहीं (है)। क्या ये आप (की भाषा में)?

00:43:40.347 --> 00:43:42.976
मुमुक्षु: हाँ! कोई पेट से सीखकर 
नहीं आया है। सब यहीं आकर सीखते हैं।

00:43:43.000 --> 00:43:50.865
पू. लालचंदभाई: धीमे-धीमे, धीमे-धीमे, 
जैसे-जैसे अभ्यास करे आत्मा के लक्षपूर्वक 
तो आहिस्ते-आहिस्ते ज्ञान की खिलवट...

00:43:50.889 --> 00:43:54.874
मुमुक्षु: वो स्वाध्याय में बैठती है नियम से।
पू. लालचंदभाई: बैठती हैं?
मुमुक्षु: हाँ! सारा काम छोड़-छाड़कर।

00:43:54.898 --> 00:43:56.927
पू. लालचंदभाई: रसोई-वसोई 
(भोजन बनाना) नहीं करती?
मुमुक्षु: नहीं! कुछ नहीं करती।

00:43:56.951 --> 00:44:01.425
पू. लालचंदभाई: बहुत अच्छा! 
रसोई वो करती है।
मुमुक्षु: बहू करती है।

00:44:01.449 --> 00:44:07.647
सुमेघा करती है 
और वो भी वहाँ से सुनती रहती है सब।

00:44:07.671 --> 00:44:13.332
पू. लालचंदभाई: अच्छा! अच्छी बात है! 
बहुत वातावरण अच्छा है। 
मुमुक्षु: उसको (लग्नी) लगी है अभी।

00:44:13.356 --> 00:44:27.278
पू. लालचंदभाई: ऐसा, अच्छा अच्छा, बहुत अच्छा!
अभी तो समय हो गया। थकावट होती है। 
मूल point (बिंदु) तो आ गया, मुख्य आ गया।

00:44:27.302 --> 00:44:34.354
और पहले बात की न, 
वो ख्याल में रखना कि एकत्व क्यों होता है। 
वहाँ तो भिन्नत्व है।

00:44:34.378 --> 00:44:37.660
मुमुक्षु: हाँ! 
वहाँ तो भिन्नत्व किया उसने। 
पू. लालचंदभाई: भिन्नत्व है ही वहाँ तो।

00:44:37.684 --> 00:44:43.914
तीर्थंकर भगवान - भगवान और 
उनकी देह भिन्नत्व है। 
इधर भी भिन्नत्व है। हें?

00:44:43.938 --> 00:44:50.772
तो एकत्व क्यों आपको लगता है, 
इसका कारण क्या है? (क्योंकि) 
इंद्रियज्ञान से आप जानते हैं।

00:44:50.796 --> 00:44:57.140
तो इंद्रियज्ञान जिसको जानता है 
उसमें भेदज्ञान करने की ताकत नहीं है, 
एकत्व करता है इंद्रियज्ञान।

00:44:57.164 --> 00:45:01.296
मुमुक्षु: इंद्रियज्ञान में 
भेदज्ञान नहीं हो सकता है। 
पू. लालचंदभाई: नहीं हो सकता है।

00:45:01.320 --> 00:45:05.923
मुमुक्षु: इंद्रियज्ञान में एकत्व होता है। 
पू. लालचंदभाई: एकत्व होता है; 
जानकर, जाने हुये का श्रद्धान हो गया।

00:45:05.947 --> 00:45:12.474
देह को जाना तो देह मेरा। 
बबलू को जाना तो बबलू मेरा। 
दुकान को जाना तो दुकान मेरी।

00:45:12.498 --> 00:45:18.536
इंद्रियज्ञान का ही ऐसा धर्म है 
(कि) एकत्व कर लेता है, 
ममत्व करता है। और अतीन्द्रियज्ञान...

00:45:18.560 --> 00:45:21.594
मुमुक्षु: तो ये भेदज्ञान जो चलता है 
वो किसमें चलता है?

00:45:21.618 --> 00:45:31.376
पू. लालचंदभाई: वो मानसिकज्ञान, 
सविकल्प भेदज्ञान (है)। उसका नाम 
सविकल्प-भेदज्ञान, उसका अर्थ- वो व्यवहार (है)।

00:45:31.400 --> 00:45:37.772
निश्चय के साथ व्यवहार होता है 
तो वो व्यवहार है। 
शुभभाव करना व्यवहार नहीं।

00:45:37.796 --> 00:45:43.065
(दोनों) भिन्न-भिन्न हैं 
ऐसा विचार करना उसका नाम व्यवहार है।

00:45:43.089 --> 00:45:50.376
ये बराबर कहा कि 
(जो) चलता है मानसिकज्ञान में 
(वो) क्या है? वो व्यवहार है।

00:45:50.400 --> 00:45:53.016
मुमुक्षु: ये भेदज्ञान जो चलता है 
वो मानसिकज्ञान में चलता है?

00:45:53.040 --> 00:45:57.594
पू. लालचंदभाई: मानसिकज्ञान में 
जो भेदज्ञान का विचार आता है 
उसका नाम व्यवहार है।

00:45:57.618 --> 00:46:05.932
शुभभाव करना व्यवहार नहीं है। 
शुभभाव से मेरा आत्मा भिन्न है, 
ऐसा विचार करना उसका नाम व्यवहार है।

00:46:05.956 --> 00:46:24.718
और आत्मा का अनुभव कर लेना 
उसका नाम निश्चय (है)।

00:46:24.742 --> 00:46:27.629
मुमुक्षु: मानसिकज्ञान में 
जो भेदज्ञान चलता है 
उसका नाम व्यवहार है।

00:46:27.653 --> 00:46:33.007
पू. लालचंदभाई: व्यवहार है 
और आत्मा का अनुभव कर लेना 
उसका नाम निश्चय है।

00:46:33.031 --> 00:46:35.887
उसके द्वारा 
आत्मा का धीमे-धीमे अनुभव हो जाएगा।

00:46:35.911 --> 00:46:42.025
भेदज्ञान जो किया न कि 
देह मेरा नहीं है, मैं ज्ञानमयी आत्मा हूँ, 
राग मेरा नहीं है, मैं जाननेवाला हूँ -

00:46:42.049 --> 00:46:46.056
ऐसा भेदज्ञान का विचार आया 
तो आप आत्मा के पक्ष में आ गए।

00:46:46.080 --> 00:46:52.003
भेदज्ञान में क्या है 
कि व्यवहार का निषेध, 
व्यवहार का निषेध आता है।

00:46:52.027 --> 00:46:57.389
मुमुक्षु: आत्मा का पक्ष आता है। 
पू. लालचंदभाई: आत्मा का पक्ष आता है। 
बराबर है! सही बात है।

00:46:57.413 --> 00:47:00.878
आत्मा का पक्ष आता है।
मुमुक्षु: आत्मा का पक्ष आता है 
वो ही व्यवहार है।

00:47:00.902 --> 00:47:03.936
पू. लालचंदभाई: वो व्यवहार है। 
आत्मा के पक्ष का नाम व्यवहार है।

00:47:03.960 --> 00:47:10.385
और व्यवहार का पक्ष हो, 
पर का पक्ष हो तो अज्ञान (है); 
व्यवहार भी नहीं।

00:47:10.409 --> 00:47:14.354
व्यवहार की बात, 
व्यवहार की बात भी अलग है।

00:47:14.378 --> 00:47:22.585
जैन-दर्शन में व्यवहार है। 
जैन-दर्शन का व्यवहार अलग है।

00:47:22.609 --> 00:47:27.056
मुमुक्षु: भेदज्ञान के द्वारा 
जो आत्मा का अनुभव होता है वो निश्चय है?

00:47:27.080 --> 00:47:33.736
पू. लालचंदभाई: वो निश्चय है - 
भेदज्ञान के द्वारा अभेद का अनुभव होता है।

00:47:33.760 --> 00:48:01.923
भेदज्ञान के द्वारा बाद में 
अभेद का अनुभव हो जाता है।

00:48:01.947 --> 00:48:07.065
इस व्यवहार की किसी को खबर नहीं, 
क्रिया-कांड करो उसका नाम व्यवहार 
(मानते हैं)।

00:48:07.089 --> 00:48:11.092
ये व्यवहार नहीं है, ये तो अज्ञान है।

00:48:11.116 --> 00:48:17.309
करने की बात आई न? 
करना तो स्वभाव में नहीं है। 
उसको जानना!

00:48:17.333 --> 00:48:24.247
जो शुभभाव आवे, 
भगवान की पूजा का भाव आया, 
उसको जानना उसका नाम व्यवहार

00:48:24.271 --> 00:48:37.109
और आत्मा को जानना उसका नाम निश्चय। 
सीधी बात है!

00:48:37.133 --> 00:48:41.629
अच्छा हुआ आप तीनों इधर आ गए। 
अच्छा हुआ!

00:48:41.653 --> 00:48:56.887
बाद में मन छूट जाता है, मन मर जाता है। 
प्रयत्न चालू रखना बस, भैया! बस।

00:48:56.911 --> 00:49:02.416
मुमुक्षु: इंद्रियज्ञान में विचार होता है?
पू. लालचंदभाई: विचार होता है। 
अतीन्द्रियज्ञान में साक्षात् प्रत्यक्ष अनुभव होता है।

00:49:02.440 --> 00:49:32.972
मानसिकज्ञान परोक्ष है, लिख लो। 
मानसिकज्ञान परोक्ष है 
और आत्मिकज्ञान प्रत्यक्ष होता है।

00:49:32.996 --> 00:49:42.625
जाननेवाला हूँ, 
ज्ञान और आनंद की मैं मूर्ति हूँ 
- ऐसा ख्याल में आ जाता है।

00:49:42.649 --> 00:49:53.967
अनुमान ज्ञान में आता है। 
मानसिकज्ञान कहो कि अनुमान ज्ञान (कहो, 
एक ही बात है)।

00:49:53.991 --> 00:49:58.874
जैसे कोई जमीन ली आपने 
और मकान बनाने का नक्शा बनाया।

00:49:58.898 --> 00:50:06.496
नक्शा तो बना न? 
तो भी नक्शे के द्वारा आपको ख्याल में आया, 
अनुमान में आया कि ऐसा मकान बनेगा।

00:50:06.520 --> 00:50:11.403
बस! 
जब मकान बनेगा तब प्रत्यक्ष होगा, ऐसा।

00:50:11.427 --> 00:50:16.003
मुमुक्षु: मानसिकज्ञान में प्रमाण?
पू. लालचंदभाई: मानसिकज्ञान में अनुमान, 
अनुमान आता है।

00:50:16.027 --> 00:50:23.465
जैसा है स्वरूप ऐसा ख्याल में आ जाता है।

00:50:23.489 --> 00:50:31.056
आत्मा का पक्ष आता है न, 
तब आत्मा का स्वभाव क्या है, उसके ख्याल 
में, उसके मानसिकज्ञान में आ जाता है।

00:50:31.080 --> 00:50:52.834
बाद में वो छूट जाता है 
विचार-विकल्प 
(जब) आगे बढ़ता है तब। बस!

00:50:52.858 --> 00:50:56.220
मुमुक्षु: ये ही धर्म है। 
पू. लालचंदभाई: वहाँ से धर्म की शुरुआत (है)।

00:50:56.244 --> 00:51:08.629
आत्मा के अनुभव से धर्म की शुरुआत 
होती है; बाकी कोई क्रिया-कांड में बाह्य 
के अशुभ में नहीं, शुभभाव में नहीं। आहाहा!

00:51:08.653 --> 00:51:17.696
<b>अनुभव चिंतामनि रतन, अनुभव है रसकूप; 
अनुभव मारग मोखकौ, अनुभव मोख सरूप</b> 
(नाटक समयसार उत्थानिका श्लोक १८) ऐसा!

00:51:17.720 --> 00:51:25.074
अनुभव से ही धर्म की शुरुआत, 
आत्मा के अनुभव से वृद्धि और 
अनुभव से पूर्णता, अरिहंत दशा हो जाती है।

00:51:25.098 --> 00:51:33.696
मुमुक्षु: कितना ही शुभभाव से 
पूजा करो वो धर्म नहीं है।
पू. लालचंदभाई: शुभभाव है।

00:51:33.720 --> 00:51:36.234
मुमुक्षु: शुभभाव है।
पू. लालचंदभाई: शुभभाव तो है।

00:51:36.258 --> 00:51:42.809
बंध का कारण है, 
मोक्ष का कारण नहीं है। 
कषाय की मंदता है।